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।#पूर्णिमा_व्रत_की_पौराणिक_कथा
प्राचीन काल की बात है कांतिका नगर में एक धनेश्वर नाम का ब्राह्मण रहता था। जो अपना जीवन निर्वाह दूसरों के दान के भरोसे किया करता था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, लेकिन सभी ने उसे ताने मारते हुए बांझ कहकर बुलाया और भिक्षा देने से मना कर दिया। तब किसी ने उससे 16 दिन तक माँ काली की पूजा करने को कहा। उसके कहे अनुसार ब्राह्मणी ने ऐसा ही किया।
उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर 16 दिन बाद माँ काली प्रकट हुई। माँ काली ने ब्राह्मण की पत्नी को गर्भवती होने का वरदान दिया और उससे कहा कि वह अपने सामर्थ्य अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा को दीपक जलाए, इस तरह वह हर पूर्णिमा के दिन एक दीपक बढ़ाती जाए जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं। एक दिन ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से आम का कच्चा फल तोड़कर दिया। उसकी पत्नी ने पूजा की और फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई।
प्रत्येक पूर्णिमा को वह माँ काली के कहे अनुसार दीपक जलाती रही। माँ काली की कृपा से उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदास रखा गया। देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेज दिया। काशी में उन दोनों के साथ एक दुर्घटना घटी जिसके कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया। देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है परंतु फिर भी जबरन उसका विवाह करवा दिया गया। कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था, इसलिए काल उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया।
तभी से कहा जाता है कि पूर्णिमा के दिन व्रत करने से संकट से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।